Wednesday, April 6, 2016

वक़्त ये कम्बख़्त


बुलाने से आता नहींभेजने से जाता नहीं,
बस में किसी केकभी वक़्त समाता नहीं,
है कितना शातिरजो एहमियत अपनी
गुज़रे बिना कभीये कम्बख़्त जताता नहीं...

जो तेज़ निकलेतो लगे है रफ़्तार,
जो हौले चलेतो लगे इंतज़ार,
कभी मीलों की दूरी, लगे पल भर की
कभी पलों का फ़ासलालगे मील हज़ार...

या तो कल के चेहरे पर, आस बनकर,
या फिर कल के पर्दे पर, काश बनकर,
गिरता क्यूँ नहीं वक़्त, आज के पहलू में,
हर एक पल एक नया, पलाश बनकर...

अक्सर रास्तों पर कभीऐसा मोड़ आता है,
जोड़ता नहींहद से ज़्यादा हमें तोड़ जाता है,
मगर उन्हीं रास्तों परअगर चलते चलें हम,
अगला मोड़ पिछले का नज़ारा, वहीं छोड़ जाता है...

जो मिले वक़्त से पहलेतो कीमत नहीं रहती,
जो मिले वक़्त के बादतो चाहत नहीं रहती,
जानता है वक़्तकब किसकी कितनी है औकात,
जो मिले आज में वो लेंतो बाक़ी ज़रूरत नहीं रहती...

जो माँगने से मिले, तो ये मौहलत कहलाए,
जब बिन माँगे मिले, तो ये फ़ुरसत कहलाए,
जो करे लम्हों की लापरवाही, वो क्या जाने,
दो पल की याद भी कई बार दौलत कहलाए...

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