Wednesday, April 6, 2016

उम्मीदों की दीवार


जो हो गया सो हो गया
जो था ना मेरा खो गया...

खुली हुई आँखों के ज़रिए
खोया रहूँ या होश पाऊँ
लेके दोनों ख़ाली हथेली
फ़रियाद करूँ या माल्ता जाऊँ

काली यादें फाड़ दी मैनें
तेरी उस तस्वीर से
एक रखा रंगीन टुकड़ा
बस तेरी तस्वीर से
ग़ौर फ़रमाता हूँ अब जब
सोचता हूँ खुद ही मैं तब
मैं ही मैं के इस जहाँ में
कभी कहीं चलो हम भी थे

अब सुकून की सीढ़ियाँ
जैसे जैसे चढ़ता हूँ मैं
एक तरफ़ा इस जंग में आगे
तरफ़ शय के बढ़ता हूँ मैं
हैरत है की मुझको हुआ है
सुकून भरा ये कैसा गुमा है
कमज़ोर अपनी ही उम्मीदों की
दीवार पर खड़ा हूँ मैं...

जो हो गया सो हो गया
जो था ना मेरा खो गया...


- अंशुल नागोरी

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