Wednesday, April 6, 2016

महफ़िल


महफ़िल वो नहीं, जहाँ चेहरों की तादाद हो,
महफ़िल तो वो है, जहाँ ख़याल आबाद हो...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ कल्मे इर्शाद हों,
महफ़िल तो वो है, जहाँ तारीफ़ आज़ाद हो...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ पहचान गुमनाम हो,
महफ़िल तो वो है, जहाँ हर तरफ सलाम हो...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ पर्दे का काम हो,
महफ़िल तो वो है, जहाँ मुलाकात एक इनाम हो...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ ख़र्च बेशुमार हो,
महफ़िल तो वो है, जहाँ ख़िदमत शानदार हो...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ पकवानों की भरमार हो,
महफ़िल तो वो है, जहाँ हर निवाला लज़्ज़तदार हो...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ इशारे नज़र-अंदाज़ हों,
महफ़िल तो वो है, जहाँ इशारे नज़र की आवाज़ हों...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ पूरी हर फ़रमाइश हो,
महफ़िल तो वो है, जहाँ और कोशिश की गुंजाइश हो...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ सज़ा का ख़ौफ़ हो,
महफ़िल तो वो है, जहाँ गुस्ताखियाँ माफ़ हों...

महफ़िल वो नहीं, जहाँ डर डर कर हर काम हो,
महफ़िल तो वो है, जहाँ देखा जाए जो अंजाम हो...


- अंशुल नागोरी

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