Wednesday, April 6, 2016

दिल की ज़मीं पर



दिल की ज़मीं पर मेरे, गर रेत बिछ जाती
तेरे कदमों के ये निशाँ सारे, हवा उड़ा ले जाती...

रह जाती न कोई भी, तेरे जाने की रहगुज़र
तुझे ढूँढने की हर कोशिश, हर उम्मीद ही मिट जाती...

एक फूँक से ही अपनी, मैं सारी खरोचें भर लेता
न कोई खून रिस्ता, न कभी कमज़ोरी आती...

रेगिस्तानों में कहाँ भला कभी, खिलते हैं ग़ुलाब,
कुछ नहीं तो आसुओं की सिंचाई ही बच जाती...

सराबों में चमकते हुए, तुझे जी भर के मैं देखता,
हक़ीकत में न सही, तू ख्वाबों में ही मिल जाती...

- अंशुल नागोरी




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