फ़ुरसत
मिली है ख़यालों से, तो
एक ख़याल मन में आया है,
कि
क्या ख़याल है आपका, ये
ख़याल कहाँ से आते हैं...?
बिन
बुलाए मेहमान बनकर, तो
कभी ईद का चाँद बनकर,
मालिक
खुद अपनी मर्ज़ी के, क्यूँ
ये हमे सताते हैं?
ये
ख़याल कहाँ से आते हैं...?
ना
वक़्त की समझें नज़ाकत, ना
लिहाज़ करें हालातों का,
बस
एक अकेले की आड़ में, पूरी
फौज ले आते हैं...
ये
ख़याल कहाँ से आते हैं...?
ना
दिखाई देते, ना सुनने में आते, और
ना कभी महसूस हैं होते,
बावजूद
इसके हर दफ़ा हम, क्यूँ
इनमें खो जाते हैं?
ये
ख़याल कहाँ से आते हैं...?
तरो
ताज़ा तो कभी मैले से, आज
से कभी बरसों पहले से,
मुस्कुराते
तो कभी ज़िद्द हैं करते, मुझे
डराते तो कभी खुद डर जाते हैं...
ये
ख़याल कहाँ से आते हैं...?
कभी
बीते हुए कल में जाकर, हारी
हुई बाज़ियों से,
ताश
के पत्तों को समेट, काश
का महल बनाते हैं...
ये ख़याल कहाँ से आते हैं...?
तो
कभी बीते हुए कल से ही, ख़ुशी
के चन्द लम्हें चुन,
आज
की इस ज़मीन पर, यादों
की सेज सजाते हैं...
ये
ख़याल कहाँ से आते हैं...?
जैसे
जैसे मेरे मन की सतह, फैल
रही है कई दिशाओं में,
कहीं
किसी कोने में अब ये, एक
बूँद से ल़हेरें उठाते हैं...
ये
ख़याल कहाँ से आते हैं...?
शायद
वक़्त के बहते दरिया में, ख़याल
ही सफ़र करते हैं,
हम
तुम तो कुछ पलों के लिए, इनमे
तैरते हैं और डूब जाते हैं..
जाने ये ख़याल कहाँ से आते हैं...?
-
अंशुल नागोरी
No comments:
Post a Comment