Wednesday, April 6, 2016

एक सिर्फ़ ये ज़िंदगी


है चन्द पलों में बँधी, ये ज़िंदादिल ज़िंदगी
इसके किसी भी सिरे को, तुम खुला छोड़ जाना नहीं
     है एक सिर्फ़ ये ज़िंदगी
     इसे फिर वापिस आना नहीं...

आएँगे ऐसे मंज़र भी, अकेले होगे तुम कभी
खुदा तुम्हारे साथ होगा, खुद को अकेला पाना नहीं
     है एक सिर्फ़ ये ज़िंदगी
     इसे फिर वापिस आना नहीं...

ख़ुशियों के लम्हें आएँगे कल, क़ामयाबी होगी साथ हर पल
क़ामयाबी के पलों में कभी, अपनों को भूल जाना नहीं
     है एक सिर्फ़ ये ज़िंदगी
     इसे फिर वापिस आना नहीं...

रूठे जो कोई दोस्त अगर, चाहे किसी भी बात पर
मानाना उसे हर दम, कहीं तुम रूठ जाना नहीं
     है एक सिर्फ़ ये ज़िंदगी
     इसे फिर वापिस आना नहीं...

चाहो जिसे तुम यूँ दिन रात, कह देना उसे अपने दिल की बात
मिले ना मिले वो ये सोच कर, कहीं तुम सोचते रह जाना नहीं
     है एक सिर्फ़ ये ज़िंदगी
     इसे फिर वापिस आना नहीं...

जो हुआ अच्छा हुआ, और जो होगा अच्छा ही होगा
बस दिल से करना हर काम, मुक़ाम से तुम कभी घबराना नहीं
     है एक सिर्फ़ ये ज़िंदगी
     इसे फिर वापिस आना नहीं...

है एक समंदर एक आसमाँ, एक जगह दोनो मिलते जहाँ
उस मिलन से पहले ज़िंदगी की रेत पर, निशान कुछ तुम छोड़ जाना कहीं
     है एक सिर्फ़ ये ज़िंदगी
     इसे फिर वापिस आना नहीं...

- अंशुल नागोरी


No comments:

Post a Comment