Wednesday, April 6, 2016

बिना खोले खिड़कियाँ


कल बातों बातों में
उसने मुझसे पूछ लिया
कितना वक़्त हो गया है
इन खिड़कियों को खोले हुए...?

माना की इन्हे बंद किया था,
की नुकीले कंकर कहीं चुभ न जाएँ
बेमौसम बरसात फर्श भिगा न दे
पर तेज़ गुज़रते वक़्त के पहियों ने
रास्ते की धूल इनपर जमा दी है...
      अब बताओ, बिना खोले खिड़कियाँ
      क्या शीशे साफ कर पाओगे?

पहले इन्हें खोलने को तुम कितने आतुर थे,
इनसे आती हवा के सुर में मिलते सुर थे,
अब खामोशी के दमे में दम नहीं घुटता,
पहले तो ना खुद में तुम इतने मगरूर थे...
       ज़रा सोचो, बिना खोले खिड़कियाँ,
       क्या ठीक से साँस ले पाओगे?

पहले तो इन खिड़कियों पर, इतराती थीं गुस्ताखियाँ,
कभी तीखी सी शिकायतें, कभी मीठी सी माफियाँ,
मिला करती थीं इन पर, दो मासूम मुस्कानें
जब बँधा करते थे इशारों इशारों में काफिया...
       कहो, बिना खोले खिड़कियाँ,
       क्या बातों का बोझ उठा पाओगे?

परवाह करते हो मेरी, मैं भला जानती हूँ,
इंसानों में मेहमान और मेहमानों में इंसान को पहचानती हूँ
इन झरोखों से तुम भी एक बार झाँक कर तो देखो
हर बंद दरवाज़े की चाबी इन्हे मानती हूँ
     किसी को, बिना खोले खिड़कियाँ,
     किस हद तक परख पाओगे?

बाहरी दीवारों को तो सभी कितना सजाते हैं
पर घर में जो है उसे सब से छिपाते हैं
अंदर का कचरा गर अंदर ही रह जाए
ता उम्र फिर बीमारियों से रिश्ता निभाते हैं
     कह रही हूँ मैं, बिना खोले खिड़कियाँ,
     क्या तुम घर चमका पाओगे?

तो बस इतनी सी बात थी
की कल बातों बातों में
मेरी रूह ने मुझसे पूछ लिया
कितना वक़्त हो गया है
इन आँखों को खोले हुए?

- अंशुल नागोरी
      




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