Wednesday, April 6, 2016

चुना नहीं था मैनें तुमको


काली अंधेरी रात में कल
बुरा सा एक सपना देखा
इस कदर पहले कभी ना मैनेंतुम्हें मेरा अपना देखा

तुम्हें मुझसे करके अलगमेरे हक़ पे उंगली उठ रही थी
धीरे धीरे रग-रग से मेरीतुम्हारी हस्ती अब मिट रही थी

चुना नहीं था मैनें तुमकोना तुम्हारी कोई मर्ज़ी चली थी
बस यूँही किसी और से हुमकोएक दूसरे की मंज़िल मिली थी

मैं तो नासमझ था उस वक़्तअच्छा बुरा भला क्या जानता
पर आज तुमसे बेहतर वजूद मेंमैं किसी और को नहीं मानता

इल्म है जिससे मुझको मेरातुम ही तो वो पहचान हो
तुम्हारे सिवा मैं हूँ जैसेमानो कोई अंजान हो

कभी-कभार देखा है मैनेंतुम्हारे हमशक्ल मिल जाते हैं
मैं तो फ़र्क पहचान हूँ लेतालोग धोके में पड़ जाते हैं

जब भी कभी हुआ ऐसा कीमज़ाक तुम्हारा बनाया गया
तौहीन हुई मेरी मान करएक पल भी मुझसे सहा ना गया

गुमान हो चला है अब किख़्वाब में भी नहीं गवारा
होगा मुझको तुम्हारे बिनाफिरते रहना बन के आवारा

फिर क्यूँ कल रात सपने मेंजाने ये कैसे हो गया
देखते ही देखते मुझसे मेरा, 'नामजुदा कहीं हो गया...

- अंशुल नागोरी


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