ज़िंदगी
के सफ़र के एक नाज़ुक मोड़ पर
दौड़ते
हुए वक़्त का थामा हाथ छोड़ कर
आ
गयीं थी रहें फिर उसी मंज़िल पर हमारी
उन
मौज भरे पलों की फिर आ गयी थी बारी
मुद्दतो बाद इस बार फिर मिले थे हम...
नज़र
आए थे हमें कुछ जाने पहचाने से
क़दमों
के कुछ निशाँ उस गुज़रे ज़माने से
उन्हीं
क़दमों पर क़दम रख
गुज़री
अपनी ही परच्छाई से
मुद्दतो बाद इस बार फिर मिले थे हम...
क्या
बदल गया हूँ मैं, हर पल मैं सोचता था
एक
वही पुराना 'मैं' हर पल मैं खोजता था
कहीं
ना कहीं अपने आप से
अंदर
ही अंदर चुपचाप से
मुद्दतो बाद इस बार फिर मिले थे हम...
यादों
की वो किताब पुरानी सिरहाने खुली बैठी थी
उदासी
भरे पन्नों में वो उदास बनी यूँ ऐंठी थी
कुछ
नये पन्नों पर कुछ नयी यादें
लिखने
मौज भारी कुछ नयी बातें
मुद्दतो बाद इस बार फिर मिले थे हम...
चाहे
अब रहें जहाँ ले जाएँ, एक सच हैं हमने जाना
इन
यादों की जैसे हमें आदत हो गयी है रोज़ाना
वक़्त
हो कोई, दूरी हो कोई, चाहे हो कोई बहाना
मुद्दतो
बाद फिर से हमें हैं यहीं लौट कर आना
मुद्दतो बाद अगली बार फिर मिलेंगे हम...
-
अंशुल नागोरी
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