एक अजब सा सुकून है
बगल वाली पटरी पर
नज़र जमा कर, नज़र दौड़ाने
में
मेरी नब्ज़ की रफ़्तार से चल रही है
धूप की चमक उस पर...
कुदरत ने अपनी धड़कनें शायद
हल्की सी ढील लिए
बिजली के तारों में महफूज़ रखी है
जो ये आसमान के पर्दे पर
करतब कर रहे हैं...
कुछ कोरे, कुछ हरे,
कुछ भूरे, कुछ भरे,
बेतरतीब से हैं ये परबत
जो तराशते हैं, निखारते हैं
उफक़ के सुनहरे चेहरे को...
बीच बीच में लंबे गेहरे जब
पुलों से गुज़रती है ये रेल
मेरे ख़यालों की गूँज नीचे
दरिया के तल से टकराकर
और बेहतर सुनाई देती है...
सफ़र के हैं, सफ़र में हैं
तमाम ये एहसास
सिर्फ़ सफ़र से हैं...
मंज़िल तो बस सफ़र की
मामूली सी एक मजबूरी है...
- अंशुल नागोरी
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