यादों
में जिसकी मैं झूमता हूँ
चाहत
दिल में लिए घूमता हूँ
मेरी
नज़रों में वो क़ैद कहीं
ख़्वाबों
के बीच हक़ीकत सी हो
मेरे दिल में बसी चाहत सी वो...
जो
आए तो खिल उठे जहाँ
मुस्कुराए
तो महक जाए समाँ
अदाएँ
उसकी, ये बातें उसकी
मासूम
कभी, कभी शरारत सी हो
मेरे दिल में बसी चाहत सी वो...
जो
देखे वो देखता रह जाऊँ मैं
कुछ
पूछे तो कुछ ना कह पाऊँ मैं
जब
भी मिले नज़रों से नज़रें
हँसी
से खिलती सूरत सी हो
मेरे दिल में बसी चाहत सी वो...
मिल
के वो कहीं ना खो जाए
अफ़साना
ना ये सब हो जाए
हर
राह हर मोड़ पर कहीं
ख़ुदा
की कोई इबादत सी हो
मेरे दिल में बसी चाहत सी वो...
ग़म
में भी दोनों साथ रहें
दोनो
दिलों में ये जस्बात रहें
हर
कल में मेरे हर पल में मेरे
रोज़ाना
किसी आदत सी हो
मेरे दिल में बसी चाहत सी वो...
-
अंशुल नागोरी
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