Thursday, December 29, 2016

धन काला

है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला,
हो गया जितना ये मन काला, है बटोरा उतना ये धन काला...

<stanza 1>
बलिदान अमन ईमान का जो,
हरदम था परचम लहराया,
लहराते इस तिरंगे पे क्यों,
पड़ा घमंड का घना साया,

इस ऊँघते अनमने साये ने, कर दिया है सारा वतन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...

<stanza 2>
उठते थे जो सम्मानों में,
वो हाथ बँधे अब रहते हैं,
मिलते थे जो ईमानों में,
वो हाथ बँधे अब रहते हैं,

अब जब मिलते हाथों से हाथ, धारक को दिया है वचन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...

<stanza 3>
क्यूँ हिम्मत उन आवाज़ों की,
ठिठुर के काँप सी जाती है,
क्यूँ क़िस्मत उन परवाज़ों की,
भरते ही नाप ली जाती है,

उग पाए ना सवालों का सूरज, क्यूँ छाया ऐसा है अमन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...
हो गया जितना ये मन काला, है बटोरा उतना ये धन काला...

एक छींटा


सारी बूँदें झर गईं, सारा पानी बह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

याद वो आती बहुत थी, बूँद जो राह में मिली,

बादलों में लुक्का-छुप्पी, दोनों ने बड़ी खेली,

बादलों सा वो समाँ, उड़ बादलों की तरह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

धूप में पौंछे पसीने, बूँद के माथे से उसने,

और बारिशों से बचाया, सतरंगी छाते में उसने,

ख़याल करने की ख़यालों में गिनता वजह गया, 

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

आसमाँ से जो चले थे, साथ खा कर के क़सम,

होगी हासिल जब ज़मीन, साथ होंगे तुम और हम,

टकराया जो शीशे से, क़िला क़समों का ढह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

वक़्त अब आया करीब, और ज़मीन आई नज़र,

झौंके तेज़ हवा के थे, सख़्त न थी पकड़ मगर, 

नाज़ुक हाथ वो बूँद का, जाने किस जगह गया, 

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

रहा रेंगता धीरे धीरे, हाथ पाँव वो  मारता, 

कोई तो आये बचाए, ख़ामोशी से पुकारता ,

रोता रहा वो सूखे आँसू, पीता वह विरह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

नज़र आये कुछ और छींटे, ज़िंदा थे पर अधमरे, 

कोशिशें तो हुईं मगर, छींटा पहुँच से था परे,

जो भी छींटा गुज़रता, देता दुआएँ वह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

हार मानी न थी उसने, पर हिम्मत घटने लगी,

देखते ही देखते, हस्ती उसकी मिटने लगी,
आएगा बरसात बन , जाते जाते वह कह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

अलविदा कहने का अन्दाज़


फिसल जाती है ज़बाँ अक्सर, ज़रा संभल के देखो,
अलविदा कहने का अन्दाज़, ज़रा बदल के देखो,

कामयाबियों में अपनी, यूँ सोते हो जागते हो,
औरों की नादानियों में, ज़रा बहल के देखो,

जाता हुआ कोई, कब किसे अच्छा लगता है,
कभी तो बच्चों की तरह, बिलख के मचल के देखो,

 क्या जताना चाहते हो, घड़ी की ओर देखकर,
वक़्त कह रहा है प्यारे, "इशारे इस पल के देखो",

नज़रें चुरा के जो गए, तो घाव गहरे हो गए,
तसल्ली भरी एक नज़र का मरहम तो मल के देखो,

फितरतों को तो हमारी, पसंद आती हैं ग़लतियाँ,
ख़ूबियों तले ख़ामियों को, ज़रा मसल के देखो,

बातें तो सौ तरह की, पर अलविदा हरदम एक सा,
जो रदीफ़ क़ाफ़िये हैं देखना, तो किसी ग़ज़ल के देखो,

अगली मुलाक़ातें अक्सर, मुकम्मल नहीं हो पातीं,
जाते जाते फिर लौट आओ, एक दफ़ा यूँ चल के देखो...

यार इंतज़ार में

यार इंतज़ार में, रुक तो जाना
दिल एक सिगड़ी है, फूँक तो जाना

इश्क़ की रोटी को, ज़रा ज़रा खाएँ
हर दिन की मेहमान, है भूक तो जाना

कोएले हालातों के बिखरे हैं राहों पर
साथ उठाने इन्हें, ज़रा झुक तो जाना

शक़ भरी हवा वफ़ा की लौ जो बुझाए
साथ रखना भरोसे की बंदूक़ तो जाना

लगे ना इन लम्हों को फफूँद मौसमों की
लाओ ज़रा यादों का संदूक तो जाना

कारख़ाना वक़्त का


जाने कौन यूँ सिरे वक़्त के, खुरदरा किए जाता है,
जाने क्यूँ हर लम्हा मेरा, ज़ख़्म हरा किए जाता है,

कल कुछ थे, कुछ आज हैं, कुछ क़रीब, तो हैं कुछ दूर,
वक़्त के इस कारख़ाने में, और भी तो हैं कितने मज़दूर,

माना हिस्से में हमारे, तू मंज़र सारे बुरे दे,
पर हर दफ़ा उन्ही ज़ख़्मों को, क्यूँ बार बार कुरेदे?

ठाना है हर शाम को मैंने, कि कल आके मरम्मत करूँ,
कारख़ाना ये थमता ही नहीं, अब किस से मैं शिकायत करूँ?

रात को जब सोता हूँ बस, तब ही राहत मिल पाती है,
कानों में मेरे एक आवाज़, हौले से कहे ये जाती है,

"खेल तो है ये नसीबों का, वक़्त तो केवल मोहरा है,
लम्हे लम्हे छिपा हुआ, कारख़ाने के मालिक का चेहरा है"

पता मालिक का पता कर, मैं दे दी छुट्टी की अर्ज़ी,
पलट जवाब ये आया उसका, तू रहा हमेशा ही क़र्जी,

इन लम्हों का कोई दोष नहीं, तेरे कर्मों से ये बेख़बर,
ध्यान से देखा उस ख़त पर, मेरे माज़ी के थे हस्ताक्षर..

मेरी आवाज़ और तू


मुझ को तो है नाज़ बड़ा, अपने इस अनूठे राज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में,

ईमाँ से कोशिश करता हूँ, हर बार सुरीला गाने की,
हर हरकत पर हरकत सही, हर ताल से ताल मिलाने की,
खोकले मगर पर लगते हैं, सुरों की हर परवाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

दौर-ए-खाँसी दे जाती हैं, जमीं हुई खराशें कल की,
चुभती हैं रह रह के कभी, तीखे काटों के शक्ल की,
वक़्त का मरहम असर करे, कल के बजाय आज में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

हर रोज़ गुनगुनी यादों की, हल्की सी सेंक लगता हूँ,
जो रूह से रूह को सुनाई दे, वो तान मैं एक लगाता हूँ,
काश कभी कर सकूँ बयाँ, जो छुपा है दिल के दराज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

हैं सुर भले ही सात सही, ये गीत हज़ार बनाते हैं,
एक नहीं सौ बार की, कोशिश पर वजूद में आते हैं,
एक एक कर लम्हे पिरोता हूँ, बरसों के मेरे रियाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

भरी-भरी एक महफ़िल हो, तरह-तरह के साज़ सही,
एक तराशी धुन हो कोई, चुनिंदा अल्फ़ाज़ सही,
आए कैसे पर तेरे बिना, एहसास मेरे  अन्दाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...