Wednesday, April 6, 2016

काश मैं एक बादल होता


ना होता कोई मेरा नाम
ना मेरा कोई पता होता
दिखता औरों की ही तरह
पर मेरा ना कोई हमशक्ल होता
    काश मैं एक बादल होता...

रास्ते की परवाह ना होती
हवा पर मेरा भरोसा होता
होते ना कोई मील के पत्थर
दचकों का ना कोई दखल होता
    काश मैं एक बादल होता...

ना होते मेरे कोई नाक-नक्श
ना दिखावे का कोई मोल होता
जैसा हूँ इस पल में मैं
ठीक वैसा उस पल होता
    काश मैं एक बादल होता...

ना तोलने के लिए आँखें होतीं
ना बोलने के लिए होती ज़बान
ना बटोरने के लिए दो हाथ होते
ना छिपाने का कोई छल होता
    काश मैं एक बादल होता...

दूर की नज़र कमज़ोर ना होती
राई का पहाड़ों से टकराया ना होता
धूल, मिट्टी और कंकरों के बीच
गँवाया ना मैने अपना जल होता
    काश मैं एक बादल होता...

प्यास मेरी कूछ होती ऐसी
औरों की बुझाकर अपनी बुझाता
ना भीड़ को मैं पीछे धकेलता
ना नाम कमाने के लिए बेकल होता
    काश मैं एक बादल होता...

    काश मैं एक बादल होता...

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