दिल के किसी एक कोने में, जिसका पता मुझसे खो गया था
मैनें दो ख्वाहिशें रक्खी थीं
महफूज़, चुपचाप, सीली हुई, की उनपर वक़्त की ठंडी बर्फ
जम गयी थी...
आज तुझसे दो बातें क्या कर लीं, वो बर्फ अब पिघलने लगी है...
ये दो ख्वाहिशें तुझसे कोई, पहली नज़र की दिलकशी नहीं थी
और ना ही पाने की कोई मुराद, जो मैंने मन ही मन कही थी,
ये तो बस तेरी
मुस्कुराहट
की दो मीठी
आवाज़ें थीं...
आज तुझसे दो बातें क्या कर लीं, वो आवाज़ें अब खनकने लगी हैं...
ये दो ख्वाहिशें तुझसे कोई, वास्ता बनाने की चाल ना थी
तुझ पर रौब जमाने की कोशिश, या फिर कोई कमाल ना थीं
ये तो बस तेरी
मौजूदगी
की दो तरीन
पहचानें थीं...
आज तुझसे दो बातें क्या कर लीं, वो पहचानें नज़र आने लगी हैं...
ये दो ख्वाहिशें तुझ तक कोई, उम्मीदों का बना पुल ना था
अपने मतलब से रखूं मतलब, ऐसा मतलब मेरा बिल्कुल ना था
ये तो बस तेरी
सलामती
की दो मासूम
दुआएं थीं...
आज तुझसे दो बातें क्या कर लीं, वो दुआयें रंग दिखलने लगी हैं...
जान-बूझ कर कभी भी मैंने, तुझे दोस्त से ज़्यादा ना माना
खोता रहा चाहा जिस जिसको, चाहता ना था तुझे खो जाना
ये ख्वाहिशें ही
तो बस
मेरे मन की दो
चट्टाने थीं...
आज तुझसे दो बातें क्या कर लीं, इन चट्टानों में दरारें पड़ने लगी हैं...
शायद किसी मोड़ पर कभी, तुझे भी ये सवाल आया हो
की हो मेरे लिए कोई ख्वाहिश, या फिर कोई ख़याल आया हो
तेरे सौ रूखे
इनकरों में
यही दो तेरी
रज़ाएं थीं...
आज तुझसे दो बातें क्या कर लीं, ये रज़ायें अब मुमकिन लगने लगी हैं...
- अंशुल नागोरी
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