Monday, February 27, 2017

आँखों की अशर्फ़ियाँ

अशर्फ़ियाँ, अशर्फ़ियाँ
इन आँखों की अशर्फ़ियाँ...

अश्क़ अश्क़ उबलें जो, ख़ामियाँ उभरती हैं,
पलकों को झपका कर, हामियाँ ये भरती हैं रे...
ये बोलियाँ, ये बोलियाँ,
इन आँखों की ये बोलियाँ...

भौहों को उचका कर, ये कमाल करती हैं,
दिखें जो अचानक फिर, ये सवाल करती हैं रे...
नादानियाँ, नादानियाँ
इन आँखों की नादानियाँ...

कभी टहलें कोने कोने, कभी पीछा करती हैं,
हर हँसी मज़ाक़ पर ये, दूरी सींचा करती हैं रे...
ख़ामोशियाँ ख़ामोशियाँ
इन आँखों की ख़ामोशियाँ...

तकते तकते कितने दफ़े, क्या कुछ कह जाती हैं,
टकरा जाएँ एक दफ़ा, नज़रें फिर चुराती हैं रे...
बेमानियाँ, बेमानियाँ
इन आँखों की बेमानियाँ...

रेशे रेशे ख़्वाहिशों के, खुल खुल के चुनती हैं,
मूँदी मूँदी रह कर फिर, ख़ाब ख़ाब बुनती हैं रे...
ये ख़ूबियाँ ये ख़ूबियाँ
इन आँखों की ये ख़ूबियाँ...

मिलें एक लम्हे को, सदियाँ जमा देती हैं,
लम्हा लम्हा ले लेकर, लाखों कमा लेती हैं,
अशर्फ़ियाँ, अशर्फ़ियाँ
इन आँखों की अशर्फ़ियाँ...

Sunday, February 26, 2017

दरवाज़े


आगाजों के बिगुल परकभी हैं खुलते दरवाज़े...
अंजामों के ताबूद कोकभी हैं ढंकते दरवाज़े...

हालातों से बातचीत, ये करते रहते हैं अक्सर
बाहर कभी तो कभी अंदर, हैं निकलते दरवाज़े...

बायीं कभी तो कभी दाहिनी, दीवार पर हैं टँगे होते
क्यों  आज कल बीच में से, हैं ये खुलते दरवाज़े...



आँखों में उतर तो आता हैरंग हल्का सा नीयत का,
आँखों से पहले दस्तक मेंइसे दिखलाते दरवाज़े...

ख़ामोशी का ऐलान, तो कोई इनसे सीखे,
आवाज़ ज़ोर की करते हैं, जब बंद हैं होते दरवाज़े...

नज़दीकियों को मंज़ूरी, मिला करती है उस वक़्त,
खुला छोड़ने पर चुपचाप, जब हैं बोलते दरवाज़े...



 होता कोई काज घिनौना होते कोई राज़ दफ़न,
 अंदर से  बाहर सेजो बंद हो सकते दरवाज़े...

राज़ सभी खुल जाते हैंसुनो जो इन दरवाज़ों से,
क्यों बेचारी दीवारों कोबदनाम हैं करते दरवाज़े...

देहलीज़ें तो होती हैं, आखिर इन्हीं दरवाजों से,
कौन आया और कौन गयाहै तय करते दरवाज़े...



भरी क़िताब



नयी क़िताब ये कोरी क़िताब 
ये क़िताब बड़े ही नाम की
मेरी क़िताब ये भरी क़िताब
ये क़िताब मेरे किस काम की..?

पन्नों के दो जानिब पर
गए उकेरे किस्सों के
लफ्ज़ मतलबी आपस में 
एक दूजे के हैं घुल गए...
    अब देखूँ तो लगते हैं
    तादाद किसी अवाम की
    ये क़िताब मेरे किस काम की..?
    ये क़िताब मेरे किस काम की..?

कुछ पन्नों पर ग़लती से
छपी हुई न थीं लकीरें
कहाँ कब क्यों कैसे की
एक जैसी सारी जंजीरें
    ग़लत थीं तो ग़लत सही
    शक्ल में एक ईनाम की
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?

नापसंद थे कुछ पन्ने
पलटता था मैं ज़ोरों से
दिखाई देती हैं अब तक 
दरारें पड़ी जो शोरों से
   तब भी मैं नाक़ाम रहा  
   आज भी हूँ नाकाम ही
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?

पन्ना आख़िरी जो था उसका  
जाने क्यों बड़ा ख़ास था
ख़्वाबों की थी ख़ुश्बू में भीगी 
कलाकारियों का रास था
   याद अब वो दिलाता है
   फुरसत भरे आराम की
   ये क़िताब मेरे किस काम की..
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?

कहानी अब एक दिखती है
किरदार गुफ़्तगू करते हैं
छुपे सवालों के पहलु में  
जवाब आरज़ू रखते हैं
   पर खाली पन्नों के बिना
   ये क़िताब रद्दी के दाम की..
   ये किताब मेरे किस काम की..
   ये किताब मेरे किस काम की..


Thursday, December 29, 2016

धन काला

है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला,
हो गया जितना ये मन काला, है बटोरा उतना ये धन काला...

<stanza 1>
बलिदान अमन ईमान का जो,
हरदम था परचम लहराया,
लहराते इस तिरंगे पे क्यों,
पड़ा घमंड का घना साया,

इस ऊँघते अनमने साये ने, कर दिया है सारा वतन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...

<stanza 2>
उठते थे जो सम्मानों में,
वो हाथ बँधे अब रहते हैं,
मिलते थे जो ईमानों में,
वो हाथ बँधे अब रहते हैं,

अब जब मिलते हाथों से हाथ, धारक को दिया है वचन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...

<stanza 3>
क्यूँ हिम्मत उन आवाज़ों की,
ठिठुर के काँप सी जाती है,
क्यूँ क़िस्मत उन परवाज़ों की,
भरते ही नाप ली जाती है,

उग पाए ना सवालों का सूरज, क्यूँ छाया ऐसा है अमन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...
हो गया जितना ये मन काला, है बटोरा उतना ये धन काला...

एक छींटा


सारी बूँदें झर गईं, सारा पानी बह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

याद वो आती बहुत थी, बूँद जो राह में मिली,

बादलों में लुक्का-छुप्पी, दोनों ने बड़ी खेली,

बादलों सा वो समाँ, उड़ बादलों की तरह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

धूप में पौंछे पसीने, बूँद के माथे से उसने,

और बारिशों से बचाया, सतरंगी छाते में उसने,

ख़याल करने की ख़यालों में गिनता वजह गया, 

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

आसमाँ से जो चले थे, साथ खा कर के क़सम,

होगी हासिल जब ज़मीन, साथ होंगे तुम और हम,

टकराया जो शीशे से, क़िला क़समों का ढह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

वक़्त अब आया करीब, और ज़मीन आई नज़र,

झौंके तेज़ हवा के थे, सख़्त न थी पकड़ मगर, 

नाज़ुक हाथ वो बूँद का, जाने किस जगह गया, 

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

रहा रेंगता धीरे धीरे, हाथ पाँव वो  मारता, 

कोई तो आये बचाए, ख़ामोशी से पुकारता ,

रोता रहा वो सूखे आँसू, पीता वह विरह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

नज़र आये कुछ और छींटे, ज़िंदा थे पर अधमरे, 

कोशिशें तो हुईं मगर, छींटा पहुँच से था परे,

जो भी छींटा गुज़रता, देता दुआएँ वह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

हार मानी न थी उसने, पर हिम्मत घटने लगी,

देखते ही देखते, हस्ती उसकी मिटने लगी,
आएगा बरसात बन , जाते जाते वह कह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

अलविदा कहने का अन्दाज़


फिसल जाती है ज़बाँ अक्सर, ज़रा संभल के देखो,
अलविदा कहने का अन्दाज़, ज़रा बदल के देखो,

कामयाबियों में अपनी, यूँ सोते हो जागते हो,
औरों की नादानियों में, ज़रा बहल के देखो,

जाता हुआ कोई, कब किसे अच्छा लगता है,
कभी तो बच्चों की तरह, बिलख के मचल के देखो,

 क्या जताना चाहते हो, घड़ी की ओर देखकर,
वक़्त कह रहा है प्यारे, "इशारे इस पल के देखो",

नज़रें चुरा के जो गए, तो घाव गहरे हो गए,
तसल्ली भरी एक नज़र का मरहम तो मल के देखो,

फितरतों को तो हमारी, पसंद आती हैं ग़लतियाँ,
ख़ूबियों तले ख़ामियों को, ज़रा मसल के देखो,

बातें तो सौ तरह की, पर अलविदा हरदम एक सा,
जो रदीफ़ क़ाफ़िये हैं देखना, तो किसी ग़ज़ल के देखो,

अगली मुलाक़ातें अक्सर, मुकम्मल नहीं हो पातीं,
जाते जाते फिर लौट आओ, एक दफ़ा यूँ चल के देखो...

यार इंतज़ार में

यार इंतज़ार में, रुक तो जाना
दिल एक सिगड़ी है, फूँक तो जाना

इश्क़ की रोटी को, ज़रा ज़रा खाएँ
हर दिन की मेहमान, है भूक तो जाना

कोएले हालातों के बिखरे हैं राहों पर
साथ उठाने इन्हें, ज़रा झुक तो जाना

शक़ भरी हवा वफ़ा की लौ जो बुझाए
साथ रखना भरोसे की बंदूक़ तो जाना

लगे ना इन लम्हों को फफूँद मौसमों की
लाओ ज़रा यादों का संदूक तो जाना

कारख़ाना वक़्त का


जाने कौन यूँ सिरे वक़्त के, खुरदरा किए जाता है,
जाने क्यूँ हर लम्हा मेरा, ज़ख़्म हरा किए जाता है,

कल कुछ थे, कुछ आज हैं, कुछ क़रीब, तो हैं कुछ दूर,
वक़्त के इस कारख़ाने में, और भी तो हैं कितने मज़दूर,

माना हिस्से में हमारे, तू मंज़र सारे बुरे दे,
पर हर दफ़ा उन्ही ज़ख़्मों को, क्यूँ बार बार कुरेदे?

ठाना है हर शाम को मैंने, कि कल आके मरम्मत करूँ,
कारख़ाना ये थमता ही नहीं, अब किस से मैं शिकायत करूँ?

रात को जब सोता हूँ बस, तब ही राहत मिल पाती है,
कानों में मेरे एक आवाज़, हौले से कहे ये जाती है,

"खेल तो है ये नसीबों का, वक़्त तो केवल मोहरा है,
लम्हे लम्हे छिपा हुआ, कारख़ाने के मालिक का चेहरा है"

पता मालिक का पता कर, मैं दे दी छुट्टी की अर्ज़ी,
पलट जवाब ये आया उसका, तू रहा हमेशा ही क़र्जी,

इन लम्हों का कोई दोष नहीं, तेरे कर्मों से ये बेख़बर,
ध्यान से देखा उस ख़त पर, मेरे माज़ी के थे हस्ताक्षर..

मेरी आवाज़ और तू


मुझ को तो है नाज़ बड़ा, अपने इस अनूठे राज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में,

ईमाँ से कोशिश करता हूँ, हर बार सुरीला गाने की,
हर हरकत पर हरकत सही, हर ताल से ताल मिलाने की,
खोकले मगर पर लगते हैं, सुरों की हर परवाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

दौर-ए-खाँसी दे जाती हैं, जमीं हुई खराशें कल की,
चुभती हैं रह रह के कभी, तीखे काटों के शक्ल की,
वक़्त का मरहम असर करे, कल के बजाय आज में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

हर रोज़ गुनगुनी यादों की, हल्की सी सेंक लगता हूँ,
जो रूह से रूह को सुनाई दे, वो तान मैं एक लगाता हूँ,
काश कभी कर सकूँ बयाँ, जो छुपा है दिल के दराज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

हैं सुर भले ही सात सही, ये गीत हज़ार बनाते हैं,
एक नहीं सौ बार की, कोशिश पर वजूद में आते हैं,
एक एक कर लम्हे पिरोता हूँ, बरसों के मेरे रियाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

भरी-भरी एक महफ़िल हो, तरह-तरह के साज़ सही,
एक तराशी धुन हो कोई, चुनिंदा अल्फ़ाज़ सही,
आए कैसे पर तेरे बिना, एहसास मेरे  अन्दाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

Tuesday, May 24, 2016

थे मशगूल



थे मशगूल जो हम तेरी, चाल से चाल मिलाने में,
ले आए ये कदम न जाने, किस मंज़र अंजाने में...

नज़रों से नज़रों की तेरी, तस्वीर हम ने बनाई थी,
और ख्वाबों के काजल लिए, इनकी पलकें सजाई थीं,
फिर आँसुओं की बाढ़ ने जो, रंग इनके इस कदर उतारे,
डरते हैं अब किसी और से, नज़र से नज़र लड़ाने में...

था वो वक़्त जब वक़्त को, मैं साँचे में ढालता था,
इसके नन्हे से लम्हों को, मैं बड़े शौक से पालता था,
हैरत है क़ि मुझी को ये, अब यूँ पलट कर काटते हैं,
जाता हूँ जब इन्ही को, प्यार से फुसलाने मैं...

चीज़ों से मेरी बन गया, तेरा एक ऐसा नाता था,
एक नया रिश्ता इनसे मैं, तेरे लिए निभाता था,
बेवफा तो तू निकली, इनका पर मैं क्या करूँ?
नहीं खरीदता कोई भी, अब इन्हे आने दो आने में...

काश किसी तरह अब तेरी, यादों को मैं छांट पाता,
ज़हन से अपने हिम्मत कर, हल्के हल्के काट पाता,
सिखाता जिस जिसको भी, सबक मैं बेवफ़ाई का,
साथ देता इनमें से फिर, एक टुकड़ा नज़राने में...

थे मशगूल जो हम तेरी, चाल से चाल मिलाने में,
ले आए ये कदम न जाने, किस मंज़र अंजाने में...



- अंशुल नागोरी

पहाड़ और समंदर

                      (1)

है आज एक पुरानी कहानी याद आई
धरती पर कहीं रहा करते थे दो भाई
चाहते तो थे एक दुसरे को वो बहुत
पर उनकी आपस में कभी बन न पाई

एक को था बुलंदियों से लगाव
तो दुसरेे का मक़सद था फ़ैलाव
ज़िद्द पर आख़िर अड़ गए जब दोनों
चाहते थे पाना हर हाल हर ख़्वाब

पहाड़ को फिर दी गयी ऊँचाई
समंदर के हिस्से में आई गहराई
एक में से दुसरे को करके अलग
कुदरत ने वाह क्या तरक़ीब अपनाई

निकल पड़े दोनों होकर यूँ जुदा
अपने अपने सफ़र कह के अल्विदा
तब से आज तक है दुनिया से सारी
ये राज़ छिपा हुआ सदियों से सदा

                      (2)

एक पानी है जो ये राज़ बख़ूबी जानता है
बिन कहे बस बहे दोनों की बातें मानता है
बरसातों में पहाड़ों से समंदर तक बहकर
गर्मियों वाले खतों के जवाब उफानता है

एक हवा है जो समंदर पे बेफ़िक्र फ़िरती है
मस्तमौला बन फिर पहाड़ों में तैरती है
रफ़्तार से ऐसी भी क्या दिल्लगी उसकी
कहीं ठहर क्या कभी वो भी साँसें भरती है?

एक सूरज है जो बड़े मज़े से जलता है
जो देखे उसे उसके हिसाब से ढलता है
कभी समंदर के आग़ोश में सर रख कर
कभी लुढ़कते हुए पहाड़ों में संभलता है

एक चाँद है जो दूर बैठा आराम फ़रमाता है
एक फूँक से ही समंदर पे लेहरें बरपाता है
अलसाया हुआ अपनी अधखुली आँखों से
जब मर्ज़ी पहाड़ों पर रोशनी बिखराता है

                      (3)

वैसे ग़ुस्सा इन भाइयों को ख़ूब आता है
जाने कौन किससे बड़ा कहर ढाता है
एक है जो मुँह से उगलता आग है
तो दूसरा पल भर में निगल जाता है

पर एक बात है जो इन दोनों में खास है
दोनों से मुलाकातों में सुकून का एहसास है
एक बार जो चख ले इनकी मदमस्ती को
फिर ख़त्म होती न कभी भूख, न कभी प्यास है

कहते हैं ढूँढने वाला हर मंज़िल पा जाता है
पहाड़ हो या समंदर, ख़ुद अपनी राह बनाता है
एक को तय कर कभी दूसरों तक पहुँचता है
तो दूसरे को तय कर कभी खुद से मिल जाता है

ख़ैर हमारे हिस्से में जितने दिन और रात हैं
देखा जाये तो सब एक शतरंज की बिसात है
हम तो बस प्यादे हैं इन्हीं के हुक्म केे
चाल तो चलते आख़िर यही दो हज़रात है

- अंशुल नागोरी 

Wednesday, April 6, 2016

बिना खोले खिड़कियाँ


कल बातों बातों में
उसने मुझसे पूछ लिया
कितना वक़्त हो गया है
इन खिड़कियों को खोले हुए...?

माना की इन्हे बंद किया था,
की नुकीले कंकर कहीं चुभ न जाएँ
बेमौसम बरसात फर्श भिगा न दे
पर तेज़ गुज़रते वक़्त के पहियों ने
रास्ते की धूल इनपर जमा दी है...
      अब बताओ, बिना खोले खिड़कियाँ
      क्या शीशे साफ कर पाओगे?

पहले इन्हें खोलने को तुम कितने आतुर थे,
इनसे आती हवा के सुर में मिलते सुर थे,
अब खामोशी के दमे में दम नहीं घुटता,
पहले तो ना खुद में तुम इतने मगरूर थे...
       ज़रा सोचो, बिना खोले खिड़कियाँ,
       क्या ठीक से साँस ले पाओगे?

पहले तो इन खिड़कियों पर, इतराती थीं गुस्ताखियाँ,
कभी तीखी सी शिकायतें, कभी मीठी सी माफियाँ,
मिला करती थीं इन पर, दो मासूम मुस्कानें
जब बँधा करते थे इशारों इशारों में काफिया...
       कहो, बिना खोले खिड़कियाँ,
       क्या बातों का बोझ उठा पाओगे?

परवाह करते हो मेरी, मैं भला जानती हूँ,
इंसानों में मेहमान और मेहमानों में इंसान को पहचानती हूँ
इन झरोखों से तुम भी एक बार झाँक कर तो देखो
हर बंद दरवाज़े की चाबी इन्हे मानती हूँ
     किसी को, बिना खोले खिड़कियाँ,
     किस हद तक परख पाओगे?

बाहरी दीवारों को तो सभी कितना सजाते हैं
पर घर में जो है उसे सब से छिपाते हैं
अंदर का कचरा गर अंदर ही रह जाए
ता उम्र फिर बीमारियों से रिश्ता निभाते हैं
     कह रही हूँ मैं, बिना खोले खिड़कियाँ,
     क्या तुम घर चमका पाओगे?

तो बस इतनी सी बात थी
की कल बातों बातों में
मेरी रूह ने मुझसे पूछ लिया
कितना वक़्त हो गया है
इन आँखों को खोले हुए?

- अंशुल नागोरी
      




भूल जाता हूँ



बैठे-बैठे खिड़कियों पर, मख्मल सी तेरी याद
हौले-हौले जब इस दिल को सहलाती है
सोचते-सोचते तुझे खुली आँखों से
मैं पलकें झपकना भूल जाता हूँ...
मैं तुझे भूलना भूल जाता हूँ...

जिन-जिन रास्तों पर बन के हमसफर
बातों-बातों चले थे हम दो-चार कदम
चलते-चलते अब उन पर मीलों मील
मैं धूप में थकना भूल जाता हूँ...
मैं तुझे भूलना भूल जाता हूँ...

ज़रा-ज़रा सी काश कर ली होती
उस वक़्त इस वक़्त की ज़रा सी कद्र
देखते-देखते ख्वाबों में ख्वाहिशें
मैं नींद से जगना भूल जाता हूँ...
मैं तुझे भूलना भूल जाता हूँ...

- अंशुल नागोरी