बुलाने
से आता नहीं, भेजने से जाता नहीं,
बस
में किसी के, कभी वक़्त समाता नहीं,
है
कितना शातिर, जो एहमियत अपनी,
गुज़रे बिना कभी, ये कम्बख़्त जताता नहीं...
जो तेज़ निकले, तो लगे है रफ़्तार,
जो
हौले चले, तो लगे इंतज़ार,
कभी
मीलों की दूरी, लगे पल भर की,
कभी
पलों का फ़ासला, लगे मील हज़ार...
या तो कल के चेहरे पर, आस बनकर,
या
फिर कल के पर्दे पर, काश बनकर,
गिरता
क्यूँ नहीं वक़्त, आज के पहलू में,
हर एक
पल एक नया, पलाश बनकर...
अक्सर
रास्तों पर कभी, ऐसा मोड़ आता है,
जोड़ता
नहीं, हद से ज़्यादा हमें तोड़
जाता है,
मगर
उन्हीं रास्तों पर, अगर चलते चलें हम,
अगला
मोड़ पिछले का नज़ारा, वहीं छोड़ जाता है...
जो मिले वक़्त से पहले, तो कीमत नहीं रहती,
जो
मिले वक़्त के बाद, तो चाहत नहीं रहती,
जानता
है वक़्त, कब किसकी कितनी है औकात,
जो
मिले आज में वो लें, तो बाक़ी ज़रूरत नहीं रहती...
जो माँगने से मिले, तो ये मौहलत कहलाए,
जब बिन माँगे मिले, तो ये फ़ुरसत कहलाए,
जो करे लम्हों की लापरवाही, वो क्या जाने,
दो पल की याद भी कई बार दौलत कहलाए...
बुलाने से आता नहीं, भेजने से जाता नहीं,
बस में किसी के, कभी वक़्त समाता नहीं,
है कितना शातिर, जो एहमियत अपनी,
जो हौले चले, तो लगे इंतज़ार,
कभी मीलों की दूरी, लगे पल भर की,
या फिर कल के पर्दे पर, काश बनकर,
गिरता क्यूँ नहीं वक़्त, आज के पहलू में,
हर एक पल एक नया, पलाश बनकर...
जोड़ता नहीं, हद से ज़्यादा हमें तोड़ जाता है,
मगर उन्हीं रास्तों पर, अगर चलते चलें हम,
अगला मोड़ पिछले का नज़ारा, वहीं छोड़ जाता है...
जो मिले वक़्त के बाद, तो चाहत नहीं रहती,
जानता है वक़्त, कब किसकी कितनी है औकात,
जो मिले आज में वो लें, तो बाक़ी ज़रूरत नहीं रहती...