Wednesday, April 6, 2016

जब फ़िर आया मैं


पग पग जग जग फ़िर आया मैं
रग रग उसी मिट्टी की महक थी
जुग जुग बीते जब फिर आया मैं
आँखों आँखों बचपन की चहक थी

पल पल जतन कर क्या पाया मैं
भाग भाग बर्फ जमी कड़क थी
थक थक भटक जो दर पाया मैं
मेरे घर की मेरी वही सड़क थी

जब मन छाना इस छाया में
कोई गुबार ना कोई दहक थी
कण कण अब मेरी काया में
अमन की तिलसमी लहक थी

- अंशुल नागोरी




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