पग पग जग जग फ़िर आया मैं
रग रग उसी मिट्टी की महक थी
जुग जुग बीते जब फिर आया मैं
आँखों आँखों बचपन की चहक थी
पल पल जतन कर क्या पाया मैं
भाग भाग बर्फ जमी कड़क थी
थक थक भटक जो दर पाया मैं
मेरे घर की मेरी वही सड़क थी
जब मन छाना इस छाया में
कोई गुबार ना कोई दहक थी
कण कण अब मेरी काया में
अमन की तिलसमी लहक थी
- अंशुल नागोरी
No comments:
Post a Comment