Tuesday, May 24, 2016

थे मशगूल



थे मशगूल जो हम तेरी, चाल से चाल मिलाने में,
ले आए ये कदम न जाने, किस मंज़र अंजाने में...

नज़रों से नज़रों की तेरी, तस्वीर हम ने बनाई थी,
और ख्वाबों के काजल लिए, इनकी पलकें सजाई थीं,
फिर आँसुओं की बाढ़ ने जो, रंग इनके इस कदर उतारे,
डरते हैं अब किसी और से, नज़र से नज़र लड़ाने में...

था वो वक़्त जब वक़्त को, मैं साँचे में ढालता था,
इसके नन्हे से लम्हों को, मैं बड़े शौक से पालता था,
हैरत है क़ि मुझी को ये, अब यूँ पलट कर काटते हैं,
जाता हूँ जब इन्ही को, प्यार से फुसलाने मैं...

चीज़ों से मेरी बन गया, तेरा एक ऐसा नाता था,
एक नया रिश्ता इनसे मैं, तेरे लिए निभाता था,
बेवफा तो तू निकली, इनका पर मैं क्या करूँ?
नहीं खरीदता कोई भी, अब इन्हे आने दो आने में...

काश किसी तरह अब तेरी, यादों को मैं छांट पाता,
ज़हन से अपने हिम्मत कर, हल्के हल्के काट पाता,
सिखाता जिस जिसको भी, सबक मैं बेवफ़ाई का,
साथ देता इनमें से फिर, एक टुकड़ा नज़राने में...

थे मशगूल जो हम तेरी, चाल से चाल मिलाने में,
ले आए ये कदम न जाने, किस मंज़र अंजाने में...



- अंशुल नागोरी

पहाड़ और समंदर

                      (1)

है आज एक पुरानी कहानी याद आई
धरती पर कहीं रहा करते थे दो भाई
चाहते तो थे एक दुसरे को वो बहुत
पर उनकी आपस में कभी बन न पाई

एक को था बुलंदियों से लगाव
तो दुसरेे का मक़सद था फ़ैलाव
ज़िद्द पर आख़िर अड़ गए जब दोनों
चाहते थे पाना हर हाल हर ख़्वाब

पहाड़ को फिर दी गयी ऊँचाई
समंदर के हिस्से में आई गहराई
एक में से दुसरे को करके अलग
कुदरत ने वाह क्या तरक़ीब अपनाई

निकल पड़े दोनों होकर यूँ जुदा
अपने अपने सफ़र कह के अल्विदा
तब से आज तक है दुनिया से सारी
ये राज़ छिपा हुआ सदियों से सदा

                      (2)

एक पानी है जो ये राज़ बख़ूबी जानता है
बिन कहे बस बहे दोनों की बातें मानता है
बरसातों में पहाड़ों से समंदर तक बहकर
गर्मियों वाले खतों के जवाब उफानता है

एक हवा है जो समंदर पे बेफ़िक्र फ़िरती है
मस्तमौला बन फिर पहाड़ों में तैरती है
रफ़्तार से ऐसी भी क्या दिल्लगी उसकी
कहीं ठहर क्या कभी वो भी साँसें भरती है?

एक सूरज है जो बड़े मज़े से जलता है
जो देखे उसे उसके हिसाब से ढलता है
कभी समंदर के आग़ोश में सर रख कर
कभी लुढ़कते हुए पहाड़ों में संभलता है

एक चाँद है जो दूर बैठा आराम फ़रमाता है
एक फूँक से ही समंदर पे लेहरें बरपाता है
अलसाया हुआ अपनी अधखुली आँखों से
जब मर्ज़ी पहाड़ों पर रोशनी बिखराता है

                      (3)

वैसे ग़ुस्सा इन भाइयों को ख़ूब आता है
जाने कौन किससे बड़ा कहर ढाता है
एक है जो मुँह से उगलता आग है
तो दूसरा पल भर में निगल जाता है

पर एक बात है जो इन दोनों में खास है
दोनों से मुलाकातों में सुकून का एहसास है
एक बार जो चख ले इनकी मदमस्ती को
फिर ख़त्म होती न कभी भूख, न कभी प्यास है

कहते हैं ढूँढने वाला हर मंज़िल पा जाता है
पहाड़ हो या समंदर, ख़ुद अपनी राह बनाता है
एक को तय कर कभी दूसरों तक पहुँचता है
तो दूसरे को तय कर कभी खुद से मिल जाता है

ख़ैर हमारे हिस्से में जितने दिन और रात हैं
देखा जाये तो सब एक शतरंज की बिसात है
हम तो बस प्यादे हैं इन्हीं के हुक्म केे
चाल तो चलते आख़िर यही दो हज़रात है

- अंशुल नागोरी