Wednesday, April 6, 2016

क्या बात करते हो...?


बचपन की उस लिखाई से
रंगीन ख्वाबों की उँचाई से
     ना जाने क्या बात करते हो...?

हर जीत में लहराई से
कभी हार में गहराई से
     ना जाने क्या बात करते हो...?

महफ़िल में तन्हाई से
जो खो गया उसकी जुदाई से
     ना जाने क्या बात करते हो...?

कभी अपनी ही परछाई से
किसी बीते की याद आई से
     ना जाने क्या बात करते हो...?

कहते हो ज़्यादा, सुनते हो कम
ज़ाहिर करते खुशी, भीतर छिपे ग़म
ज़िंदादिली की इस अगुवाई से
     ना जाने क्या बात करते हो...?

सोचते हो, "ज़्यादा सोचूँगा नहीं मैं
जो चाहे हो पीछे देखूँगा नहीं मैं"
इस भ्रम की सच्चाई से
     ना जाने क्या बात करते हो...?

"जो ग़लत हुआ उसकी सज़ा दूँगा
नहीं... मैं सब कुछ भुला दूँगा"
क्या है सही, और क्या ग़लत
इस अदालत की सुनवाई से
     ना जाने क्या बात करते हो...?

अंत में क्या पाया, अंत में क्या खोया
चुने कितने मोती, कितनों को पिरोया
उस फर्श की ठंडाई से
और उस सफेद रज़ाई से
     ना जाने क्या बात करते हो...?

- अंशुल नागोरी


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