(1)
धरती पर कहीं रहा करते थे दो भाई
चाहते तो थे एक दुसरे को वो बहुत
पर उनकी आपस में कभी बन न पाई
एक को था बुलंदियों से लगाव
तो दुसरेे का मक़सद था फ़ैलाव
ज़िद्द पर आख़िर अड़ गए जब दोनों
चाहते थे पाना हर हाल हर ख़्वाब
पहाड़ को फिर दी गयी ऊँचाई
समंदर के हिस्से में आई गहराई
एक में से दुसरे को करके अलग
कुदरत ने वाह क्या तरक़ीब अपनाई
निकल पड़े दोनों होकर यूँ जुदा
अपने अपने सफ़र कह के अल्विदा
तब से आज तक है दुनिया से सारी
ये राज़ छिपा हुआ सदियों से सदा
(2)
एक पानी है जो ये राज़ बख़ूबी जानता है
बिन कहे बस बहे दोनों की बातें मानता है
बरसातों में पहाड़ों से समंदर तक बहकर
गर्मियों वाले खतों के जवाब उफानता है
एक हवा है जो समंदर पे बेफ़िक्र फ़िरती है
मस्तमौला बन फिर पहाड़ों में तैरती है
रफ़्तार से ऐसी भी क्या दिल्लगी उसकी
कहीं ठहर क्या कभी वो भी साँसें भरती है?
एक सूरज है जो बड़े मज़े से जलता है
जो देखे उसे उसके हिसाब से ढलता है
कभी समंदर के आग़ोश में सर रख कर
कभी लुढ़कते हुए पहाड़ों में संभलता है
एक चाँद है जो दूर बैठा आराम फ़रमाता है
एक फूँक से ही समंदर पे लेहरें बरपाता है
अलसाया हुआ अपनी अधखुली आँखों से
जब मर्ज़ी पहाड़ों पर रोशनी बिखराता है
(3)
वैसे ग़ुस्सा इन भाइयों को ख़ूब आता है
जाने कौन किससे बड़ा कहर ढाता है
एक है जो मुँह से उगलता आग है
तो दूसरा पल भर में निगल जाता है
पर एक बात है जो इन दोनों में खास है
दोनों से मुलाकातों में सुकून का एहसास है
एक बार जो चख ले इनकी मदमस्ती को
फिर ख़त्म होती न कभी भूख, न कभी प्यास है
कहते हैं ढूँढने वाला हर मंज़िल पा जाता है
पहाड़ हो या समंदर, ख़ुद अपनी राह बनाता है
एक को तय कर कभी दूसरों तक पहुँचता है
तो दूसरे को तय कर कभी खुद से मिल जाता है
ख़ैर हमारे हिस्से में जितने दिन और रात हैं
देखा जाये तो सब एक शतरंज की बिसात है
हम तो बस प्यादे हैं इन्हीं के हुक्म केे
चाल तो चलते आख़िर यही दो हज़रात है
- अंशुल नागोरी
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