काली अंधेरी रात में कल, बुरा सा एक सपना देखा
इस
कदर पहले कभी ना मैनें, तुम्हें मेरा अपना देखा
तुम्हें
मुझसे करके अलग, मेरे हक़ पे उंगली उठ रही थी
धीरे
धीरे रग-रग से मेरी, तुम्हारी हस्ती अब मिट रही थी
चुना
नहीं था मैनें तुमको, ना तुम्हारी कोई मर्ज़ी चली थी
बस
यूँही किसी और से हुमको, एक दूसरे की मंज़िल मिली थी
मैं
तो नासमझ था उस वक़्त, अच्छा बुरा भला क्या जानता
पर
आज तुमसे बेहतर वजूद में, मैं किसी और को नहीं मानता
इल्म
है जिससे मुझको मेरा, तुम ही तो वो पहचान हो
तुम्हारे
सिवा मैं हूँ जैसे, मानो कोई अंजान हो
कभी-कभार
देखा है मैनें, तुम्हारे हमशक्ल मिल जाते हैं
मैं
तो फ़र्क पहचान हूँ लेता, लोग धोके में पड़ जाते हैं
जब
भी कभी हुआ ऐसा की, मज़ाक तुम्हारा बनाया गया
तौहीन
हुई मेरी मान कर, एक पल भी मुझसे सहा ना गया
गुमान
हो चला है अब कि, ख़्वाब में भी नहीं गवारा
होगा
मुझको तुम्हारे बिना, फिरते रहना बन के आवारा
फिर
क्यूँ कल रात सपने में, जाने ये कैसे हो गया
देखते
ही देखते मुझसे मेरा, 'नाम' जुदा कहीं हो गया...
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अंशुल नागोरी