आगाजों के बिगुल पर, कभी हैं खुलते दरवाज़े...
अंजामों के ताबूद को, कभी हैं ढंकते दरवाज़े...
हालातों से बातचीत, ये करते रहते हैं अक्सर
बाहर कभी तो कभी अंदर, हैं निकलते दरवाज़े...
बायीं कभी तो कभी दाहिनी, दीवार पर हैं टँगे होते
क्यों न आज कल बीच में से, हैं ये खुलते दरवाज़े...
आँखों में उतर तो आता है, रंग हल्का सा नीयत का,
आँखों से पहले दस्तक में, इसे दिखलाते दरवाज़े...
आँखों में उतर तो आता है, रंग हल्का सा नीयत का,
आँखों से पहले दस्तक में, इसे दिखलाते दरवाज़े...
ख़ामोशी का ऐलान, तो कोई इनसे सीखे,
आवाज़ ज़ोर की करते हैं, जब बंद हैं होते दरवाज़े...
नज़दीकियों को मंज़ूरी, मिला करती है उस वक़्त,
खुला छोड़ने पर चुपचाप, जब हैं बोलते दरवाज़े...
न होता कोई काज घिनौना, न होते कोई राज़ दफ़न,
न अंदर से न बाहर से, जो बंद हो सकते दरवाज़े...
देहलीज़ें तो होती हैं, आखिर इन्हीं दरवाजों से,
कौन आया और कौन गया, है तय करते दरवाज़े...
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