Thursday, December 29, 2016

कारख़ाना वक़्त का


जाने कौन यूँ सिरे वक़्त के, खुरदरा किए जाता है,
जाने क्यूँ हर लम्हा मेरा, ज़ख़्म हरा किए जाता है,

कल कुछ थे, कुछ आज हैं, कुछ क़रीब, तो हैं कुछ दूर,
वक़्त के इस कारख़ाने में, और भी तो हैं कितने मज़दूर,

माना हिस्से में हमारे, तू मंज़र सारे बुरे दे,
पर हर दफ़ा उन्ही ज़ख़्मों को, क्यूँ बार बार कुरेदे?

ठाना है हर शाम को मैंने, कि कल आके मरम्मत करूँ,
कारख़ाना ये थमता ही नहीं, अब किस से मैं शिकायत करूँ?

रात को जब सोता हूँ बस, तब ही राहत मिल पाती है,
कानों में मेरे एक आवाज़, हौले से कहे ये जाती है,

"खेल तो है ये नसीबों का, वक़्त तो केवल मोहरा है,
लम्हे लम्हे छिपा हुआ, कारख़ाने के मालिक का चेहरा है"

पता मालिक का पता कर, मैं दे दी छुट्टी की अर्ज़ी,
पलट जवाब ये आया उसका, तू रहा हमेशा ही क़र्जी,

इन लम्हों का कोई दोष नहीं, तेरे कर्मों से ये बेख़बर,
ध्यान से देखा उस ख़त पर, मेरे माज़ी के थे हस्ताक्षर..

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