Thursday, December 29, 2016

एक छींटा


सारी बूँदें झर गईं, सारा पानी बह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

याद वो आती बहुत थी, बूँद जो राह में मिली,

बादलों में लुक्का-छुप्पी, दोनों ने बड़ी खेली,

बादलों सा वो समाँ, उड़ बादलों की तरह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

धूप में पौंछे पसीने, बूँद के माथे से उसने,

और बारिशों से बचाया, सतरंगी छाते में उसने,

ख़याल करने की ख़यालों में गिनता वजह गया, 

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

आसमाँ से जो चले थे, साथ खा कर के क़सम,

होगी हासिल जब ज़मीन, साथ होंगे तुम और हम,

टकराया जो शीशे से, क़िला क़समों का ढह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

वक़्त अब आया करीब, और ज़मीन आई नज़र,

झौंके तेज़ हवा के थे, सख़्त न थी पकड़ मगर, 

नाज़ुक हाथ वो बूँद का, जाने किस जगह गया, 

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

रहा रेंगता धीरे धीरे, हाथ पाँव वो  मारता, 

कोई तो आये बचाए, ख़ामोशी से पुकारता ,

रोता रहा वो सूखे आँसू, पीता वह विरह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

नज़र आये कुछ और छींटे, ज़िंदा थे पर अधमरे, 

कोशिशें तो हुईं मगर, छींटा पहुँच से था परे,

जो भी छींटा गुज़रता, देता दुआएँ वह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

हार मानी न थी उसने, पर हिम्मत घटने लगी,

देखते ही देखते, हस्ती उसकी मिटने लगी,
आएगा बरसात बन , जाते जाते वह कह गया,

शीशे पर अटका हुआ सा, एक छींटा रह गया...

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