है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला,
हो गया जितना ये मन काला, है बटोरा उतना ये धन काला...
<stanza 1>
बलिदान अमन ईमान का जो,
हरदम था परचम लहराया,
लहराते इस तिरंगे पे क्यों,
पड़ा घमंड का घना साया,
इस ऊँघते अनमने साये ने, कर दिया है सारा वतन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...
<stanza 2>
उठते थे जो सम्मानों में,
वो हाथ बँधे अब रहते हैं,
मिलते थे जो ईमानों में,
वो हाथ बँधे अब रहते हैं,
अब जब मिलते हाथों से हाथ, धारक को दिया है वचन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...
<stanza 3>
क्यूँ हिम्मत उन आवाज़ों की,
ठिठुर के काँप सी जाती है,
क्यूँ क़िस्मत उन परवाज़ों की,
भरते ही नाप ली जाती है,
उग पाए ना सवालों का सूरज, क्यूँ छाया ऐसा है अमन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...
हो गया जितना ये मन काला, है बटोरा उतना ये धन काला...
हो गया जितना ये मन काला, है बटोरा उतना ये धन काला...
<stanza 1>
बलिदान अमन ईमान का जो,
हरदम था परचम लहराया,
लहराते इस तिरंगे पे क्यों,
पड़ा घमंड का घना साया,
इस ऊँघते अनमने साये ने, कर दिया है सारा वतन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...
<stanza 2>
उठते थे जो सम्मानों में,
वो हाथ बँधे अब रहते हैं,
मिलते थे जो ईमानों में,
वो हाथ बँधे अब रहते हैं,
अब जब मिलते हाथों से हाथ, धारक को दिया है वचन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...
<stanza 3>
क्यूँ हिम्मत उन आवाज़ों की,
ठिठुर के काँप सी जाती है,
क्यूँ क़िस्मत उन परवाज़ों की,
भरते ही नाप ली जाती है,
उग पाए ना सवालों का सूरज, क्यूँ छाया ऐसा है अमन काला,
है बटोरा जितना ये धन काला, हो गया उतना ये मन काला...
हो गया जितना ये मन काला, है बटोरा उतना ये धन काला...
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