Thursday, December 29, 2016

मेरी आवाज़ और तू


मुझ को तो है नाज़ बड़ा, अपने इस अनूठे राज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में,

ईमाँ से कोशिश करता हूँ, हर बार सुरीला गाने की,
हर हरकत पर हरकत सही, हर ताल से ताल मिलाने की,
खोकले मगर पर लगते हैं, सुरों की हर परवाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

दौर-ए-खाँसी दे जाती हैं, जमीं हुई खराशें कल की,
चुभती हैं रह रह के कभी, तीखे काटों के शक्ल की,
वक़्त का मरहम असर करे, कल के बजाय आज में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

हर रोज़ गुनगुनी यादों की, हल्की सी सेंक लगता हूँ,
जो रूह से रूह को सुनाई दे, वो तान मैं एक लगाता हूँ,
काश कभी कर सकूँ बयाँ, जो छुपा है दिल के दराज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

हैं सुर भले ही सात सही, ये गीत हज़ार बनाते हैं,
एक नहीं सौ बार की, कोशिश पर वजूद में आते हैं,
एक एक कर लम्हे पिरोता हूँ, बरसों के मेरे रियाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

भरी-भरी एक महफ़िल हो, तरह-तरह के साज़ सही,
एक तराशी धुन हो कोई, चुनिंदा अल्फ़ाज़ सही,
आए कैसे पर तेरे बिना, एहसास मेरे  अन्दाज़ में,
कुछ तो जाने एक सा है, तुझ में और मेरी आवाज़ में...

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