Sunday, February 26, 2017

भरी क़िताब



नयी क़िताब ये कोरी क़िताब 
ये क़िताब बड़े ही नाम की
मेरी क़िताब ये भरी क़िताब
ये क़िताब मेरे किस काम की..?

पन्नों के दो जानिब पर
गए उकेरे किस्सों के
लफ्ज़ मतलबी आपस में 
एक दूजे के हैं घुल गए...
    अब देखूँ तो लगते हैं
    तादाद किसी अवाम की
    ये क़िताब मेरे किस काम की..?
    ये क़िताब मेरे किस काम की..?

कुछ पन्नों पर ग़लती से
छपी हुई न थीं लकीरें
कहाँ कब क्यों कैसे की
एक जैसी सारी जंजीरें
    ग़लत थीं तो ग़लत सही
    शक्ल में एक ईनाम की
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?

नापसंद थे कुछ पन्ने
पलटता था मैं ज़ोरों से
दिखाई देती हैं अब तक 
दरारें पड़ी जो शोरों से
   तब भी मैं नाक़ाम रहा  
   आज भी हूँ नाकाम ही
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?

पन्ना आख़िरी जो था उसका  
जाने क्यों बड़ा ख़ास था
ख़्वाबों की थी ख़ुश्बू में भीगी 
कलाकारियों का रास था
   याद अब वो दिलाता है
   फुरसत भरे आराम की
   ये क़िताब मेरे किस काम की..
   ये क़िताब मेरे किस काम की..?

कहानी अब एक दिखती है
किरदार गुफ़्तगू करते हैं
छुपे सवालों के पहलु में  
जवाब आरज़ू रखते हैं
   पर खाली पन्नों के बिना
   ये क़िताब रद्दी के दाम की..
   ये किताब मेरे किस काम की..
   ये किताब मेरे किस काम की..


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