Monday, February 27, 2017

आँखों की अशर्फ़ियाँ

अशर्फ़ियाँ, अशर्फ़ियाँ
इन आँखों की अशर्फ़ियाँ...

अश्क़ अश्क़ उबलें जो, ख़ामियाँ उभरती हैं,
पलकों को झपका कर, हामियाँ ये भरती हैं रे...
ये बोलियाँ, ये बोलियाँ,
इन आँखों की ये बोलियाँ...

भौहों को उचका कर, ये कमाल करती हैं,
दिखें जो अचानक फिर, ये सवाल करती हैं रे...
नादानियाँ, नादानियाँ
इन आँखों की नादानियाँ...

कभी टहलें कोने कोने, कभी पीछा करती हैं,
हर हँसी मज़ाक़ पर ये, दूरी सींचा करती हैं रे...
ख़ामोशियाँ ख़ामोशियाँ
इन आँखों की ख़ामोशियाँ...

तकते तकते कितने दफ़े, क्या कुछ कह जाती हैं,
टकरा जाएँ एक दफ़ा, नज़रें फिर चुराती हैं रे...
बेमानियाँ, बेमानियाँ
इन आँखों की बेमानियाँ...

रेशे रेशे ख़्वाहिशों के, खुल खुल के चुनती हैं,
मूँदी मूँदी रह कर फिर, ख़ाब ख़ाब बुनती हैं रे...
ये ख़ूबियाँ ये ख़ूबियाँ
इन आँखों की ये ख़ूबियाँ...

मिलें एक लम्हे को, सदियाँ जमा देती हैं,
लम्हा लम्हा ले लेकर, लाखों कमा लेती हैं,
अशर्फ़ियाँ, अशर्फ़ियाँ
इन आँखों की अशर्फ़ियाँ...

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