Tuesday, May 24, 2016

थे मशगूल



थे मशगूल जो हम तेरी, चाल से चाल मिलाने में,
ले आए ये कदम न जाने, किस मंज़र अंजाने में...

नज़रों से नज़रों की तेरी, तस्वीर हम ने बनाई थी,
और ख्वाबों के काजल लिए, इनकी पलकें सजाई थीं,
फिर आँसुओं की बाढ़ ने जो, रंग इनके इस कदर उतारे,
डरते हैं अब किसी और से, नज़र से नज़र लड़ाने में...

था वो वक़्त जब वक़्त को, मैं साँचे में ढालता था,
इसके नन्हे से लम्हों को, मैं बड़े शौक से पालता था,
हैरत है क़ि मुझी को ये, अब यूँ पलट कर काटते हैं,
जाता हूँ जब इन्ही को, प्यार से फुसलाने मैं...

चीज़ों से मेरी बन गया, तेरा एक ऐसा नाता था,
एक नया रिश्ता इनसे मैं, तेरे लिए निभाता था,
बेवफा तो तू निकली, इनका पर मैं क्या करूँ?
नहीं खरीदता कोई भी, अब इन्हे आने दो आने में...

काश किसी तरह अब तेरी, यादों को मैं छांट पाता,
ज़हन से अपने हिम्मत कर, हल्के हल्के काट पाता,
सिखाता जिस जिसको भी, सबक मैं बेवफ़ाई का,
साथ देता इनमें से फिर, एक टुकड़ा नज़राने में...

थे मशगूल जो हम तेरी, चाल से चाल मिलाने में,
ले आए ये कदम न जाने, किस मंज़र अंजाने में...



- अंशुल नागोरी

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