कल जिस दिन को मैनें देखा, वो आज नहीं है,
कल दिन ने जिस मुझको देखा, वो आज नहीं है,
फिर बरसों की तुम्हारी नज़रों में
तराशी मेरी पहचान को खो जाने दो...
कुछ वक़्त मुझे गुमशुदा हो जाने दो...
हर वक़्त हर बात पर मत टोको मुझे
दोस्ती तज़ुर्बे से करने से मत रोको मुझे
हर नाकामी की भुनी तीली लेकर
अगली कोशिश की लौ जलाने दो...
कुछ वक़्त मुझे गुमशुदा हो जाने दो...
हर तरकीब में मुनाफ़ा मैं क्यूँ देखूँ?
सिर्फ़ जवाहरातों का सराफ़ा मैं क्यूँ देखूँ?
सूखे पत्तों की दुनिया भी होती है सुनहरी
इनके साये में गुज़र चलाने दो...
कुछ वक़्त मुझे गुमशुदा हो जाने दो...
मंज़िलें जिन्हें मानते हम ख़्वाब हैं
दरअसल वो तो जगमगाते सराब हैं
आँखें मूंद कर मुक़द्दर के बाज़ू में
गुज़रगाह का भी लुत्फ़ उठाने दो...
कुछ वक़्त मुझे गुमशुदा हो जाने दो...
लोग तो कहेंगे काफ़ी कुछ, उन्हें मत दोहराओ
तुम तो मेरे अपने हो, ज़रा बन के भी दिखाओ
लाज़मी तो हैं लाख़ों, दुनिया के दस्तूर
कुछ मुझे तोड़ने दो, कुछ निभाने दो...
कुछ वक़्त मुझे गुमशुदा हो जाने दो...
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अंशुल नागोरी