दिन जो ढलान की ओर बढ़ रहा है
अकेला अंधेरा चुपचाप चढ़ रहा है
सर्द हवा की कहीं हुई है आहट
खामोशी भरा शोर जैसे उमड़ रहा है
इस शोर को कुछ
दूर भगाते हैं
आओ मिल के ज़रा
आग जलाते हैं...
मफ्लरों में ढके हुए चेहरे हैं
कानों पे कंटोपों के पहरे हैं
हाथों में बँधी है हथकड़ी ठंड की
जूतों में पाँव अकड़ के ठहरे हैं
इनको खोल हल्की
गर्म सेक लगाते हैं
आओ मिल के ज़रा
आग जलाते हैं...
रूठे हैं वो, आलम मायूसी का
छाया सा है
गलदस्ता अपनी ही महक से मानो मुरझाया से है
मानने के सौ तरीके, अब सब लगे
बेकार
वैसे एक ख़याल मान में फिलहाल आया सा है
क्यूँ ना धीमी
आँच पे दो बातें चढ़ाते हैं
आओ मिल के ज़रा
आ जलाते हैं...
काँपती हुई लौ जो आँखों में दिख रही है
चाहत मेरे दिल से तुम्हारे दिल पे लिख रही है
सोच सोच कर घंटो तक तुमसे की गयी बातें
इन दो पलों में मानो मुफ़्त ही बिक रही हैं
लाओ हाथ इस लौ
को बुझने से बचाते हैं
आओ मिल के ज़रा
आग जलाते हैं...
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अंशुल नागोरी