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Wednesday, April 6, 2016

दौर पीछे रह गया


रास्ते अपने सँवारने, जो हम निकल पड़े थे,
चाहे जो अपने मन, उसे पाने चल पड़े थे
    "पाने की यहाँ कोई हद नहीं
      चाहतें होती हैं कभी रद्द नहीं"
गुज़रा हुआ हर रास्‍ता, आज मुझसे कह गया
वो शुरुआतों भरा दौर, कुछ पीछे रह गया...

ग़लतियाँ जहाँ होती थीं, बिना डरे बिना रुके,
माफियां झलकती थीं, बिना हारे बिना झुके
     "रिश्तों में होता ना कोई नापतोल
      जस्बात हैं होते सबसे अन्मोल"
बिछड़ा हुआ हर नाता, आज मुझसे कह गया
वो मासूमियत भरा दौर, कुछ पीछे रह गया...

रातों में तारों को ताकना, अच्छा लगता था,
ढलता हो या उगता, हर सूरज सच्चा लगता था
     "लाए जो सुकून इस ज़हन में
      कुदरत करती है आज भी ये करिश्में"
बीता हुआ हर पहर, आज मुझसे कह गया
वो राहतों भरा दौर, कुछ पीछे रह गया...

मज़बूत करने पहचाने, जहाँ मुलाक़ातें होती थीं,
शोहरत नहीं ख़र्च जहाँ, बेहद बातें होती थीं
     "देना हो गर किसी को कोई बेशक़ीमती ख़ज़ाना
      दो उसे अपने वक़्त का एक यादगार नज़राना"
ख़रीदा हुआ हर तोहफ़ा, आज मुझसे कह गया
वो फुरसतों भरा दौर, कुछ पीछे रह गया...

नुक्स क्यूँ हम हैं निकलते, खुद में इतना उलझ कर,
इस ऐब को हैं छुपाते, दिखावे में सज धज कर
     "ख़ूबसूरती उसी ने है पाई
      क़ुबूल की जिसने सच्चाई"
ठुकराया हुआ हर मंज़र, आज मुझसे कह गया
वो सादगी भरा दौर, कुछ पीछे रह गया...


- अंशुल नागोरी