Showing posts with label darkness. Show all posts
Showing posts with label darkness. Show all posts

Wednesday, April 6, 2016

चली आती ये रात है...



थका हारा होकर जब
सूरज करवट है फेरता
अंगड़ाई लिए सबको सुलाने
     चली आती ये रात है...

शोर को है करती धीमा
गूँज को कर देती तेज़
खामोशी की चादर ओढ़े 
     चली आती ये रात है...

दबे पाँव दस्तक देकर
ख़यालों की चाभी लिए
खोलने ज़हन के दरवाज़े 
     चली आती ये रात है...

गुप्प अंधेरे की आड़ में
छुपाकर फ़र्क चेहरों का
साया ग़ुरूर का दूर भगाने
     चली आती ये रात है...

दिन भर के दाग़ धब्बे पौंछ
आँखों के अनोखे पर्दों पर
आईना अंदर का दिखलाने
     चली आती ये रात है...

डर तो मन के मैदान पर
है खेल हम से खेलता
हिम्मत हमारी आज़माने
     चली आती ये रात है...

यूँ तो रोशनी का ना होना
ही होती असल में रात है
शायद इसी रोशनी की एहमियत जताने
     चली आती ये रात है...

- अंशुल नागोरी